देवदरी की हर यात्रा चंद्रप्रभा वन्यजीव अभयारण्य की यात्रा भी है। दक्षिणी चंदौली की पहाड़ियों में 1957 में स्थापित यह उत्तर प्रदेश के सबसे पुराने संरक्षित क्षेत्रों में से एक है, और भारत के एशियाई शेरों की कहानी में इसका एक अनोखा स्थान है।
मुख्य तथ्य
| स्थापना | मई 1957 |
|---|---|
| क्षेत्रफल | 78 वर्ग किमी (चंदौली पर्यटन; विकिपीडिया)। उ.प्र. इको टूरिज़्म सोसाइटी 1957 में निर्धारित 9,600 हेक्टेयर बताती है। |
| प्रशासन | काशी वन्यजीव प्रभाग, उत्तर प्रदेश वन विभाग |
| भू-दृश्य | कैमूर पर्वतमाला (विंध्य) की उत्तरी ढलान पर नौगढ़ और विजयगढ़ की पहाड़ियाँ |
| नदियाँ | कर्मनाशा और उसकी सहायक नदी चंद्रप्रभा |
| वन का प्रकार | शुष्क पर्णपाती वन, झाड़ियाँ, घास के मैदान और नदी किनारे के जंगल |
| जलप्रपात | देवदरी, राजदरी और चंद्रप्रभा जलप्रपात |
| दर्ज समय | 06:00–17:00 (अतुल्य भारत; अस्थायी) |


इतिहास और शेर
18वीं सदी के अंत में यह जंगल बनारस के शासकों के लिए शिकारगाह के रूप में विकसित किया गया था। मई 1957 में यह वन्यजीव अभयारण्य बना। इसके कुछ ही समय बाद, एशियाई शेरों की दूसरी आबादी बसाने की भारत की शुरुआती कोशिशों में से एक के तहत, गुजरात के गिर से राजा नाम का एक शेर और रानी व जयश्री नाम की दो शेरनियाँ यहाँ लाई गईं। प्रकाशित विवरणों के अनुसार 1969 तक शेरों की संख्या ग्यारह हो गई थी, पर लगभग 1970 तक वे ग़ायब हो गए। इस विफलता को आमतौर पर आसपास की आबादी के कारण आवास पर पड़े भारी दबाव से जोड़ा जाता है।
वन्यजीव
- स्तनधारी: तेंदुआ, भालू (स्लॉथ बियर), चीतल, सांभर, नीलगाय, चिंकारा, काला हिरण, जंगली सूअर, लकड़बग्घा, सियार, लोमड़ी और साही।
- पक्षी: लगभग 150 प्रजातियाँ, जिनमें मोर, लाल जंगली मुर्गा, तीतर, बटेर, चील, गिद्ध, मैना, तोते, कोयल, उल्लू और बुलबुल शामिल हैं। देवदरी जलप्रपात की चट्टानों की दरारों में गिद्ध घोंसले बनाते हैं।
- सरीसृप: अजगर, नाग (कोबरा), करैत, पानी के साँप, गोह; नदियों में घड़ियाल दर्ज किए गए हैं।
पेड़-पौधे
आम पेड़ों में तेंदू, महुआ, पलाश, साल, नीम, सेमल, आँवला, सागौन, अमलतास, कोरैया और बेर शामिल हैं। यह जंगल आयुर्वेद में काम आने वाली औषधीय वनस्पतियों के लिए भी जाना जाता है, जैसे सफ़ेद मूसली, शतावरी, अश्वगंधा, चिरायता और सर्पगंधा।
गुफ़ाएँ और शैल चित्र
चंदौली पर्यटन पोर्टल के अनुसार नौगढ़ और विजयगढ़ के पास अभयारण्य की पहाड़ियों में कई गुफ़ाएँ हैं, जिनमें से कुछ का उपयोग कभी आदिमानव करते थे और जिनमें आज भी प्राचीन चित्र हैं। इनकी सटीक जगहें सार्वजनिक नहीं हैं; बिना अनुमति और स्थानीय गाइड के गुफ़ाओं या जंगल में न जाएँ।
घूमने के लिए
- ज़्यादातर लोग राजदरी–देवदरी जलप्रपात क्षेत्र के ज़रिए ही अभयारण्य देखते हैं।
- वन विश्राम गृह: राजदरी (अंदर), दिलकुशा (चकिया), लतीफ़ शाह, चंद्रकांता (नौगढ़) और भेसोड़ा, जिनकी बुकिंग वन विभाग से होती है। देखें कहाँ ठहरें।
- अभयारण्य के सभी नियमों का पालन करें: रास्तों पर रहें, जानवरों को न खिलाएँ, कचरा न फैलाएँ, तेज़ संगीत न बजाएँ। देखें अभयारण्य के नियम।